योग क्या है – योग की विशेषताएँ | योग के प्रकार – Yog Kya Hai | What is Yog in Hindi

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योग क्या है – ( Yog Kya Hai )

Yog Kya Hai

योग शब्द का अर्थ है जुड़ना। अर्थात आत्मा का परमात्मा से युक्त होना ही योग है। योग मन एवं शरीर के बीच सामंजस्य स्थापित करने पर ध्यान देता है। योग करने से साधक की चेतना ब्रह्मांड की चेतना से जुड़ जाती है। अर्थात योग हमें एक नये आयाम तक पहुंचाता है।

ग्रंथों और उपनिषदों के अनुसार योग को दो भागों में विभाजित किया गया है –

(1)योग साधना

(2) योग दर्शन

महर्षि पतंजलि ने ” पातंजल योग सूत्र ” में योग साधना और योग दर्शन का बड़ा हृदयग्राही वर्णन किया है।

योग की विशेषताएँ –

योग शब्द एक अति महत्वपूर्ण शब्द है जिसे अलग अलग रूपों में परिभाषित किया गया है।

(1) योग सूत्र के रचियता महर्षि पतंजलि द्वारा योग का परिभाषित रूप –

योगिस्चित्तवृत्तिनिरोध –

योगिस्चित्तवृत्तिनिरोध अर्थात चित्त ( अंत:करण ) की वृत्तियों का निरोध करना ही योग है। चित्त की वृत्तियों के कारण मनुष्य भ्रमवश अपने आप परमात्मा से अलग समझता है। तत्व ज्ञान, सेवा और प्रेम द्वारा मन की वृत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं। और परिणाम स्वरूप जीवात्मा अपने आप को परमात्मा से युक्त हुआ पाती है।

श्रीमदभगवतगीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कुछ इस प्रकार से वर्णित किया है –

योगस्थ: कुरु कर्माणि संग व्यक्तत्व धनंजय। सिद्धसिद्धियों: समो भुत्वा समंत्व योग उच्यते अर्थात –

हे धनंजय! तू आसक्ति त्यागकर समत्व भाव से कार्य कर। सिद्धि और असिद्धि में समता और बुद्धि से कार्य करना ही योग है। सुख – दुःख, जय – पराजय, शीतोष्ण आदि द्वंदों में एकरस रहना योग है।

राँगेव राघव ने कहा है कि –

शिव और शक्ति का मिले योग है।

योग के प्रकार –

(1) मंत्र योग

(2) हठ योग

(3) लय योग

(4) राज योग

मंत्र योग का अर्थ –

मंत्र से ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती हैं। मंत्र शरीर और मन दोनों पर प्रभाव डालता है।मंत्र में साधक जप का प्रयोग करता है । मंत्र जप में तीन घटकों का काफी महत्त्व है। वे घटक उच्चारण, लय और ताल हैं। तीनों का सही अनुपात मंत्र शक्ति को गति देता है।

हठ योग का अर्थ –

ह का अर्थ सूर्य तथा ठ का अर्थ चंद्र बताया गया है। सूर्य और चंद्र की समान अवस्था हठ योग है। शरीर में कई हजार नाड़ियों का वास है। उनमें तीन प्रमुख नाड़ियों का वर्णन है जो कि इस प्रकार हैं।

सूर्य नाड़ी अर्थात पिंगला जो दाहिने स्वर का प्रतीक है। चंद्र नाड़ी अर्थात इडा है जो बाएँ स्वर का प्रतीक है। इन दोनों के बीच तीसरी नाड़ी सुषुम्ना है।

इस प्रकार हठ योग वह क्रिया है जिसमें पिंगला और इडा नाड़ी के सहारे प्राण को सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कराकर ब्रह्म रंध्र मे समाधिस्थ किया जाता है।

लय योग का अर्थ –

चित्त का अपने स्वरूप में विलीन होना लय योग के अंतर्गत आता है।साधक के चित्त में जब चलते ,बैठते , सोते, उठते और भोजन करते हर समय ब्रह्म का ध्यान रहे लय योग कहलाता है।

राज योग का अर्थ –

सभी योगों का राजा राज योग कहलाया गया है क्योंकि इसमें सारे योगों के कुछ ना कुछ गुण समाहित है। राज योग को महर्षि पतंजलि द्वारा रचित अष्टांग में वर्णित है। राजयोग का विषय चित्त वृत्तियों का निरोध करना है।

राज योग के आठ अंग हैं।

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि राज योग के आठ अंग हैं।

Akansha

I’m Akansha Singh , Content writer on careerjankari.in . Now I’m working with Career Jankari .

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