Praydeep Bharat ki Nadiya – प्रायद्वीप भारत की नदियां या प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र के बारे में बताइये। तथा भारत की नदियों के किनारे बसे शहरों के नाम बताइये।

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Praydeep Bharat ki Nadiya , प्रायद्वीप भारत की नदियां , Praydeep Bharat ki Nadi Name

Praydeep Bharat ki Nadiya – प्रायद्वीप भारत की नदियां

नमस्कार दोस्तों कैरियर जानकारी के इस ब्लॉग पोस्ट में आपका स्वागत है , आज के इस पोस्ट में हम Praydeep Bharat ki Nadiya , प्रायद्वीप भारत की नदियां के बारे में विस्तार से जानकारी देंगे। तो आइए जानते हैं विस्तार से :-

South Indian River explain in Hindi :-

प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र हिमालयी अपवाह तंत्र से प्राचीन है।यह तथ्य नदियों की प्रौणावस्था और नदी घाटियों के चौडा व उथला होने से प्रमाणित होता है। पश्चिमी तट के समीप स्थित पश्चिमी घाट बंगाल की खाडी में गिरने वाली नदियों एवं अरब सागर में गिरने वाली छोटी नदियों के बीच जल विभाजक का कार्य करता है। प्रायद्वीप के उत्तरी भाग से निकलने वाली चंबल, काली सिंध, केन, बेतवा व सों नदियाँ गंगा नदी तंत्र के अंग हैं।प्रायद्वीपीय के प्रमुख नदी तंत्र महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी हैं।

Praydeep Bharat ki Nadiya

प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र का उद्वविकास :-

प्राचीन काल की तीन प्रमुख भूगर्भिक घटनाओं ने प्रायद्वीपीय भारत के अपवाह तंत्र को वर्तमान स्वरूप प्रदान किया है। आरंभिक टर्शियरी काल के दौरान प्रायद्वीपीय के पश्चिमी भाग का अवतलन या धसाव हुआ, जिससे यह भाग समुद्रतल से नीचे चला गया। परिणाम स्वरूप, मूल जल संभर् क्षेत्र के दोनों ओर नदियों की सामान्य सममित् योजना में परिवर्तित हो गया। हिमालय में होने वाले उत्थान के कारण प्रायद्वीपीय खण्ड के उत्तरी भाग का अवतलन हुआ, जिसके परिणाम स्वरूप भ्रंश द्रोणियों का निर्माण हुआ।

नर्मदा और तापी नदियाँ इन्हीं भ्रंश घाटियों में अपवाहित हो रही हैं।तथा अपरदित पदार्थ से मूल दरारों को भी भर रही है।इसलिए इन नदियों में जलोढ़ व डेल्टा निक्षेप की कमी पायी जाती है। इसी काल में प्रायद्वीपीय खण्ड उत्तर पश्चिम दिशा से दक्षिण पूर्व दिशा में झुक गया परिणाम स्वरूप इसका अपवाह बंगाल की खाडी की ओर उन्मुख हो गया।

प्रायद्वीपीय तंत्र की विशेषताएँ :-

प्रायद्वीपीय नदियों की विशेषता है, कि ये अपने एक सुनिश्चित मार्ग पर चलती है, सर्पीलाकार होकर नहीं चलती और ये बारहमासी नदियाँ या सदा नीरा नहीं हैं। ये नदियाँ समुद्र से गिरते समय डेल्टा का निर्माण करती हैं। यद्यपि भ्रंश घाटियों में बहने वाली नदियों में से नर्मदा और तापी इसक अपवाद। जो ज्वारनद मुख का निर्माण करती है।

विश्व की सबसे बड़ी एश्चुरी सेंट लॉरेंस नदी की है।

जब नदियों के मुहाने पर नदियों द्वारा बहाकर लाया गया मलबा समुद्र में चला जाता है तब इस प्रकार के समुद्र एवं नदियों के मिलन बिंदु को एश्चुरी कहते हैं।प्रायद्वीपीय नदियों की अपवाह द्रोणियों आकार में अपेक्षाकृत छोटी होती हैं।

प्रायद्वीपीय भारत बहुत ही प्राचीन भू भाग है। इसलिए इस क्षेत्र की नदियाँ वृद्धावस्था में है जो मुख्यत: वृक्षाकृतिक अपवाह तंत्र बनाती हैं। दक्षिण भारत की सभी नदियाँ अपने आधार तल पर पहुंच गई है। जिनमें अपनी घाटी को लंबवत काटने की उनकी क्षमता लगभग समाप्त हो गई है। वर्तमान में ये नदियाँ धीरे धीरे अपने किनारे को काट रही हैं। जिससे इनकी घाटियाँ चौड़ी होती जा रही हैं। इसी के परिणाम स्वरूप, इनके निचले भागों में बाढ़ का पानी बहुत बड़े क्षेत्रों में भर जाता है। संभवत: हिमालय के निर्माण के समय झटके लगने के कारण दक्षिण भारत का ढाल पूर्व की ओर हो गया था।

नर्मदा और तापी को छोड़ कर शेष सभी नदियाँ पूर्व की ओर बहती हैं। नर्मदा और तापी नदियाँ पठार के ढाल का अनुसरण न करके भ्रंश घाटियों से होकर बहती है। यही कारण है कि ये नदियां पश्चिम की ओर प्रवाहित होते हुए अरब सागर में जा मिलती हैं।

स्वर्णरेखा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, पेन्नार्, पालार, कावेरी और वैगेई दक्षिणी भारत के अपवाह तंत्र की प्रमुख नदियाँ हैं।जो पूर्व की ओर प्रवाहित होती है तथा बंगाल की खाडी में गिरती है। प्रायद्वीपीय भाग के उत्तरी भाग का ढाल उत्तर की ओर है। अत: विध्यांचल पर्वत से निकलने वाली अधिकांश नदियाँ उत्तर की ओर बहती हुई यमुना और गंगा में मिल जाती हैं। इनमें चंबल, कालीसिंध , बेतवा, केन ओर सोन नदियां प्रमुख हैं।

हिमालयी नदियों के विपरीत प्रायद्वीपीय भारत की नदियों में जल कम ज्यादा होता रहता है क्योंकि, ये वर्षा की मात्रा पर निर्भर करती है। प्रायद्वीपीय भारत की प्रमुख नदियों का उद्गम पश्चिमी घाट से होता है। पश्चिमी घाट से निकल कर पूर्व की ओर प्रवाहित होने वाली नदियाँ लंबे मार्ग का अनुसरण करती है।तथा डेल्टा का निर्माण करती है। प्रायद्वीपीय भारत में पूर्व दिशा में बहने वाली नदियों का उत्तर से दक्षिण की ओर क्रम इस प्रकार है। जैसे स्वर्ण रेखा, महा नदी, गोदावरी, कृष्णा, पेन्नार, कावेरी और वैगेई ।

सोन, नर्मदा और महानदी अमरकंटक पठार से निकलती है। सोन नदी उत्तर की ओर प्रवाहित होकर बिहार में पटना से पूर्व गंगा नदी में मिलती है।नर्मदा पश्चिम की ओर प्रवाहित होकर अरब सागर में मिलती है। तथा महानदी पूर्व की ओर प्रवाहित होते हुए बंगाल की खाडी में गिरती है। केरल में पूर्व की ओर प्रवाहित होने वाली नदियाँ पाम्बर, भवानी और क़ाबिनी हैं।।

प्रायद्वीपीय नदी तंत्र :-

प्रायद्वीपीय अपवाह में अनेक नदी तंत्र हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैं-

महानदी :-

यह एक अनुवर्ती नदी है, जो अमरकंटक पठार के सिहोवा के निकट से निकलती है। यह नदी पूर्व की ओर ओडिशा से बहती हुई अपना जल पाराद्वीप के समीप बंगाल की खाडी में विसर्जित करती है। इस नदी की लंबाई 851 me है तथा इसका जल ग्रहण 1.42 lakh varg k. M. है। इसकी अपवाह द्रोणी मध्य प्रदेश, को 36गण, झारखंड और ओडिशा में विस्तृतहै। इस नदी की अपवाह द्रोणी का 53% भाग मध्य प्रदेश , छत्तीसगण एवं 47% भाग ओडिशा राज्य में विस्तृत है। इसक निचले भाग में नौसंचालन भी होता है।

विश्व का सबसे बड़ा बांध हीराकुंड बाँध इसी नदी पर बनाया गया है। यह नदी वृक्षाकार अपवाह प्रतिरूप का निर्माण करती है।

गोदावरी नदी:-

यह प्रायद्वीपीय भारत का सबसे बड़ा नदी क्षेत्र है।गोदावरी को दक्षिण गंगा या वृद्ध गंगा या बुढी गंगा के नाम से भी जाना जाता है। यह महाराष्ट्र के नासिक जिले में तृयम्बकेश्वर् से निकलती है और दक्षिण मध्य भारत को पार कर दक्षिण पूर्व की ओर बहती हुई बंगाल की खाडी में अपना जल विसर्जित करती है। इसकी द्रोणी महाराष्ट्र , मध्य प्रदेश, छत्तीसगण, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्य से होकर बहती है। गोदावरी नदी घाटी कोयला, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस के भंडार हेतु प्रसिद्ध है। पोचमपाद एवं जयकवादी इसी नदी पर निर्मित प्रमुख जल विद्युत परियोजनाएं हैं। इसक तट पर अनेक तीर्थ स्थल जैसे नासिक, trayambkeshwae, भद्राचलम, नांदेन, राजमुंदरी, बालाघाट, औरंगबाद, नीजामाबाद आदि प्रमुख नगर स्थित है।

गोदावरी नदी पर राजमुंदरी एवं कोस्बुर को जोड़ने वाला एशिया का सबसे बड़ा रेल सह सड़क मार्ग निर्मित किया गया है।जो अभियांत्रिकी का एक उत्क्रष उदाहरण है। यह पोलावरम के दक्षिण में जहाँ इसक मार्ग के निचले भाग में भारी बाढ़ें आती हैं, एक सुद्रश्य जल प्रपात का निर्माण करती है।

कृष्णा नदी :-

यह प्रायद्वीपीय भारत की दूसरी सबसे बड़ी नदी है। इसकी द्रोणी महाराष्ट्र, करनाटक, एवं आंध्र प्रदेश में विस्तृत है।कृष्णा नदी महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट में मबलेश्वर् के निकट बंगाल की खाडी में गिरती है। कोयना, तुंगभद्रा, भीमा, मूसी, डिंडी, घाटप्रभा, पंचगंगा, एवं दूधगंगा इसकी प्रमुख सहायक नदियां हैं। जल विद्युत परियोजनाएं की दृष्टि कोण से कृष्णा नदी महत्वपूर्ण है।इस नदी पर श्रीशैलम, नागार्जुन एवं अल्माटी बांध निर्मित किये गए हैं।

कृष्णा नदी जल विवाद आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र के मध्य 1957 से चला आ रहा है।

कावेरी नदी :-

यह नदी कर्नाटक के कोडगु जिले में बृह्मागिरि पहाड़ियों से निकलती है। इसकी लंबाई 800 k. M. है।तथा यह 81,155 varg k. M. क्षेत्र को अपवाहित करती है। पहाड़ी से नीचे उतरने के बाद कावेरी नदी दक्कन पठार में प्रवाहित होती है।, जहाँ यह शिवसमुद्रम एवं श्रीरंगपट्टनम द्वीपों का निर्माण करती है। प्रायद्वीपीय की अन्य नदियों की अपेक्षा जल स्तर कम उतार चढ़ाव के साथ यह नदी लगभर वर्षभर रहती है, क्यों की इसक ऊपरी जल ग्रहण क्षेत्र में दक्षिण पश्चिमी मानसून से और निम्न क्षेत्रों में उत्तर पूर्वी मानसून से वर्षा जल प्राप्त होता है।

भारत में दूसरा सबसे बड़ा जल प्रपात कावेरी नदी बनाती है जिसे शिव समुद्रम के नाम से जाना जाता है।इस प्रपात द्वारा उत्पादित विद्युत मैसूर, बंग्लूरु एवं कोलार स्वर्ण क्षेत्र को प्रदान की जाती है। मैसूर से 20 km की दूरी बनाकर कृष्णराज सागर जलाशय का निर्माण किया जाता है। कावेरी नदी श्री रंगपट्टनम तथा शिव समुद्रम द्वीपों से होती हुई गार्जों, जलप्रपातों एवं हेयर पिन के समान अनेक मोड लेती हुई आगे बढ़ती है।

बंगाल की खाडी में गिरने से पूर्व तमिलनाडु के तंजावुर जिले के समीप एक समकोणिक डेल्टा का निर्माण करती है।उपर्युक्त बड़ी नदियों के अतिरिक्त कुछ छोटी नदियाँ हैं जो पूर्व की ओर बहती हैं। दामोदर, ब्रमानी, वैतरणी एवं स्वर्ण रेखा इसके कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।

अमरावती नदी :-

यह कावेरी की सहायक नदी है।इसका उद्गम तमिलनाडु एवं केरल की सीमा पर होता है। इसकी लंबाई 175 km है। यह करूर जिले में कावेरी से मिलती है तथा लगभग 6000 एकड़ भूमि की सिंचाई करती है। अमरावती नदी बेसिन का अत्यधिक औधोगिक होने के कारण यह नदी अत्यधिक प्रदूषित हो गई है।

नर्मदा नदी :-

यह नदी छत्तीसगण में स्थित मैकाल पर्वत के समीप अमरकंटक पठार से निकलती है। दक्षिण में सतपुडा और उत्तर में विंध्याचल श्रेणियों के मध्य भ्रंश घाटियों से बहती हुई, यह नदी संगमरमर की चट्टानों से सुंदर महाखड्ड एवं जबलपुर के निकट धुंआधार जल प्रपात बनाती हैं। नर्मदा नदी अपने मुहाने पर डेल्टा का निर्माण नहीं करती है। इसका प्रमुख कारण है कि , यह एक भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित होती है। इसलिए इसमें अवसाद का अभाव रहता है। नर्मदा नदी 1,312 km की दूरी तक प्रवाहित होने के बाद खंभात की खाडी में जा मिलती है तथा ज्वारनद बनाती है। अरब सागर में गिरने वाली यह प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी है।

सरदार सरोवर परियोजना इसी नदी पर बनाई गई है। नर्मदा द्रोणी मध्य प्रदेश, गुजरात व महाराष्ट्र के कुछ भागों में विस्तित है। नर्मदा की सहायक नदियाँ सभी छोटी हैं। जिनमें से अधिकांश समकोण पर मुख्य धारा से मिलती हैं।

तापी नदी :-

तापी का उद्गम मध्य प्रदेश के बैतुल जिले में सतपुडा की श्रृंखलाओं में स्थित मुल्ताई से होता है। यह नदी अरब सागर में ज्वारनदमुख का निर्माण करती है। यह भी नर्मदा के समांतर एक भ्रंश घाटी में बहती है, लेकिन इसकी लंबाई बहुत कम है। पश्चिम दिशा में बहने वाली यह एक अन्य महत्वपूर्ण नदी है जो 724 k. M. क्षेत्र में प्रवाहित होती है।

Conclusion

आज के इस पोस्ट में हम Praydeep Bharat ki Nadiya , प्रायद्वीप भारत की नदियां के बारे में विस्तार से जानकारी देंगे। तो आइए जानते हैं विस्तार से जाना , अगर दी गई जानकारी आपको अच्छी लगे तो इसे दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें ।

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